मैं-- मालिन मन-बगिया की

मन-बगिया में भाव कभी कविता बन महके हैं, कभी क्षोभ-कंटक बन चुभे हैं, कभी चिंतन-नव पल्लव सम उगें..

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~~~~~~ चादर की सिलवटें ~~~~~~

Posted On: 14 Mar, 2014 Others,कविता,(1) में

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बड़े सवेरे उठने पर
गनती हूँ भोर में पड़ी
चादर की सिलवटें
पता तब चलता है कि
कितनी करवटें बदली हैं मैंने
अब सोना क्या है !
क्या जगना है !
बस दिन-रैन
बिन मदिरा, बिन भांग के
खुमार में उनके ‘शब्दों’ के
डूबी सोचती हूँ
फागुन की कौन तिथि होगी ‘रंगभरी’ ?
बरसों बाद
अबकी होली खेलूंगी मैं
रंग चुकी जो उनके रंग में
ओढ़े घूम रही हूँ यह
चटख रंगों से भीगा
‘अनुराग-आवरण’ !
गेहूं की बालियों से सजे खलिहान में
अपने नर संग मादा तितर
मुझे बड़ा बिराती है
संभल-संभलकर गुजरती हूँ
जब टेढ़े-पतले मेड़ों से मैं
मोरनी भी मोर को टेर लगाती है
सहती हूँ सब
बस यह सोचकर मैं कि
‘वे’ आयेंगे तो मैं भी कितना
इठलाउंगी-इतराउंगी
कभी मुस्कराउंगी
कभी शरमाउंगी
एक-एक को ‘उनसे’ मिलवाउंगी !
– प्रियंका त्रिपाठी ‘दीक्षा’

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

    priyankatripathidiksha के द्वारा
    March 19, 2014

    आपने अपना किमती वक्त हमारे ब्लाॅग पर गुजारा…बहूत-बहूत धन्यवाद !

deepak pande के द्वारा
March 18, 2014

सुंदर और सजीव चित्रण मन के दर्पण का

    priyankatripathidiksha के द्वारा
    March 18, 2014

    प्रतिक्रया के लिए ह्रदय से आभार पांडे जी ।

March 14, 2014

sundar abhivyakti .बधाई


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