मैं-- मालिन मन-बगिया की

मन-बगिया में भाव कभी कविता बन महके हैं, कभी क्षोभ-कंटक बन चुभे हैं, कभी चिंतन-नव पल्लव सम उगें..

29 Posts

17 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 14090 postid : 778762

वह भी तो कभी लड़की ही थी !

Posted On: 31 Aug, 2014 कविता,Contest,Hindi Sahitya में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

पैदा होते ही माँ का
आंसुओं से भीगा मैंने
देखा चेहरा
खुद को घूरती देखीं
कई जोड़ी आँखें
अब पहचानती हूँ पर
उस समय तो उन्हें न पायी पहचान
बस टुकुर-टुकुर ताकती रही
मैं अनजान
शायद माँ के दुःख को भी न समझ पाती
यदि तब दादी ने आकर
लड़की जनने पर
उन्हें खरी-खोटी न सुनाई होती
ग्लानि से भर उठी मैं उसी क्षण
जानकर यह कि
मैं ही हूँ माँ के आंसुओं का कारण
आखिर कुसूर था उस जननी का क्या ?
शायद यह कि
गर्भ में ही मुझे क्यूँ न मार दिया !
लेकिन कैसे वो मुझे मारने देती
आखिर वह भी तो कभी
लड़की ही थी !

– प्रियंका त्रिपाठी ‘दीक्षा’

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

2 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

kavita1980 के द्वारा
September 2, 2014

सराहनीय प्रयास -बधाई

    priyankatripathidiksha के द्वारा
    September 7, 2014

    उत्साहवर्धन को ह्रदय से आभार !


topic of the week



latest from jagran